
पटना/मुजफरपुर। मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार, इंसेफलाइटिस और AES नामधारी बुखार से बच्चों का बचाव अब राम भरोसे है। अब तक तकरीबन 100 बच्चे काल के गाल में समा चुके हैं। इस अज्ञात ज्वर से निजात का उपाय केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्द्धन भी नहीं बता पाये। उनके साथ आये बिहार से ताल्लुक रखने वाले स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी चौबे और बिहार के हेल्थ मिनिस्टर मंगल पांडेय ने सिर्फ इंतजामात बढ़ाने का भरोसा दिया। तीनों रविवार वहां पहंचे थे।
इस बीमारी से बच्चों की लगातार हो रही मौत पर पखवाड़े भर बाद केंद्र और राज्य सरकारों की नींद खुली है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन परिवारों को 4-4 लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा की है, जिनके मासूम बीमारी का शिकार हुए। मुजफ्फरपुर में एईएस से हुई बच्चों की मृत्यु पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गहरी शोक संवेदना व्यक्त की है। मुख्यमंत्री ने इस भयंकर बीमारी से मृत हुए बच्चों के परिजनों को मुख्यमंत्री राहत कोष से शीघ्र ही चार-चार लाख रूपये अनुग्रह अनुदान देने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन एवं चिकित्सकों को इस भयंकर बीमारी से निपटने के लिए हरसंभव कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही एईस से पीड़ित बच्चों के ज़ल्द स्वस्थ होने के लिये ईश्वर से प्राथना की है।
सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर छीछालेदर होने के बाद सबकी नींद खुली है। रक्षा राज्यमंत्री और बिहार प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने स्वागत समारोहों या ऐसे आयोजनों से हफ्ते भर बचने की सलाह दी है।
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अजीत अंजुम (इलेक्टानिक मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार) ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा हैः जिस अस्पताल में अब तक 65 बच्चे मर चुके हों, उसकी बदइंतज़ामी देखकर आप हैरान होंगे। आईसीयू में मेरे सामने डॉक्टर की गैरमौजूदगी में दो बच्चों की मौत हो गई। कैमरा पहुँचने की ख़बर सुनकर भागे-भागे डॉक्टर आए और सवालों से घिरे तो दवा न होने और डॉक्टर कम होने की बात करने लगे।
जब मैं अस्पताल से अधीक्षक के पास गया तो वो शिकायत करने वाले डॉक्टर के ख़िलाफ़ कार्रवाई की बात करने लगे। मैं हॉस्पीटल सुपरिेटेंडेंट को लेकर फिर आईसीयू गया तो फिर डॉक्टर ग़ायब मिले। चीख-पुकार और चीत्कार मेरे कानों में गूँज रहा है। आप भी देखेंगे तो लगेगा कि गूँगे-बहरे सिस्टम के लिए बच्चों की ज़िंदगी कितना मायने रखती है। नेताओं और मंत्रियों का दौरा शुरू हो चुका है।
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संतोष सिंह ने लिखा हैः मुजफ्फरपुर से बच्चों की मौत की खबरें लगातार आ रही हैं। अभी थोड़ी देर पहले तक मौत का आंकड़ा सौ पार कर चुका है। वही अब ये बीमारी मुजफ्फरपुर से बाहर वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय और मोतिहारी तक फैल गयी है। आज मोतिहारी से भी दो सगे भाइयों की मौत की खबरें आयी हैं।…मुजफ्फरपुर के डीएम ने साफ कर दिया है कि जब तक बारिश नहीं होगी, तब तक मौत का यह सिलसिला थमने वाला नहीं है। इस बीच 17 तारीख यानी सोमवार को बिहार के डाक्टर भी बंगाल की घटना को लेकर एक दिन की हड़ताल पर जाने की घोषणा कर चुके हैं। मतलब सारा सिस्टम भगवान के भरोसे। ऐसे में भगवान का नाम लेने के अलावा अब बचा ही क्या है।
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पुष्यमित्र ने लिखा हैः केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने बड़े एहतराम से स्वीकार कर लिया कि चुनावी व्यवस्था की वजह से मुजफ्फरपुर में इस साल इनसेफलायटिस की जागरुकता में ढिलाई बरती गयी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी कह दिया कि लापरवाही तो हुई है। बिहार के स्वास्थ्य मंत्री भी कबूल कर आये कि 57 बच्चे मर गये।
इसके बावजूद हर तरफ सन्नाटा है। बच्चे रोज मर रहे हैं, मगर कोई अर्जेन्सी दिख नहीं रही। अखबारों में इनसेफलायटिस की खबर अन्दर के पन्नों तक पहुंच गयी है। अधिकारी बहस कर रहे हैं कि AES कहें या हायपो ग्लायसीमिया। कुपोषण है या लीची। टीम आ रही है, जा रही है। नेता अस्पताल का दौरा कर रहे हैं। पटना में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी कुछ कहने के लिये तैयार नहीं हैं।
बस एक सवाल है, जिसका कोई जवाब नहीं दे रहा? जिस स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर से 2015 से 2018 तक इस महामारी को काबू में रखा गया वह 2019 में कहां गायब हो गया? दरअसल यह मौत नहीं हत्या है। लापरवाही है। दोषियों को सजा मिलनी चाहिए।
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