
टीवी चैनल की दुनिया कभी अखबारों के लिए चुनौती बन कर उभरी थी। कयास लगाये गये कि अखबार खत्म हो जाएंगे, लेकिन टीवी चैनल आज बुरे हालात में हैं। यह स्थिति क्यों और कैसे पैदा गयी, बता रहे वरिष्ठ पत्रकार अनिल भास्कर
ये कहां आ गए हम
- अनिल भास्कर
90 के दशक में जब टीवी न्यूज चैनलों की बाढ़ आई तो लगा अखबारों का डूबना तय है। बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग, जिसमें टीवी के कई नौशुमार पत्रकार भी शामिल थे, ने अखबारों के मृत्युयोग की समवेत भविष्यवाणी शुरू कर दी। लेकिन जल्द ही यह भविष्यवाणी उसी तरह गलत साबित हुई, जिस तरह टीवी चैनलों से समष्टिमूलक पत्रकारिता की अपेक्षा। ज्यादातर चैनल दूरदर्शन के 20 मिनट के बुलेटिन से ज्यादा परोसने में कामयाब नहीं हो पाए।
दरअसल 24 घण्टे के चैनल घण्टेभर का क्लासिक कंटेन्ट भी नहीं जुटा पाए। जुटता भी कैसे? तकनीकी संसाधनों पर भारी भरकम निवेश के बाद इनपुट, आउटपुट टीम और न्यूजरूम के रूटीन खर्चों से निपटना हमेशा चुनौती बना रहा। लिहाजा रिपोर्टिंग नेटवर्क महानगरों से प्रदेशों की राजधानी तक भी मुकम्मल विस्तार नहीं पा सका। कहने को तो उन्होंने जिला मुख्यालयों तक अपने संवाददताओं की फौज खड़ी कर ली, लेकिन उन्हें दिहाड़ी पत्रकारिता से आगे नहीं ले जा सके।
यहीं से शुरू हुआ पत्रकारिता के नाम पर नाटकीयता और भौंडेपन का सफर। किसी ने एनएसडी की छात्रा को क्राइम की खबरें पढ़ने के लिए रख लिया, जो किसी खलनायिका-सी अपनी भाव-भंगिमाओं के साथ खबरें परोसने लगी। किसी ने विशेष प्रस्तुति के नाम पर स्वर्ग तक सीढ़ी लगाकर कैमरा पहुंचा दिया। कोई सांप-सपेरे की दुनिया में जा घुसा तो कोई स्टिंग ऑपरेशन का जाल बुनने लगा। कोई बोरवेल से प्रिंस निकालने में जुट गया तो कोई इंटरटेनमेंट चैनलों पर प्रसारित सीरियलों की खुरचन बटोरने-चिपकाने लगा।
टीआरपी के दंगल में हर दांव आजमाए, मगर जनसरोकारों से परहेज किया। शासन-प्रशासन की अराजकता से जुड़े मुद्दों की भी अनदेखी की। नतीजा यह कि प्रिंट मीडिया के लिए चुनौती खड़ा करने के बजाय खुद का अस्तित्व बचाये रखने के संकट से जूझने लगे। कई तो कब दस्तक देकर निकल लिये पता ही नहीं चला।
टीवी पत्रकारिता आज भी किसी अबूझ पहेली से कम नहीं। एक एंकर टीवी पर आकर कहता है कि टीवी मत देखिए। दूसरा कहता है- खबर वही, जो हम दिखाएं। कोई फटाफट खबरें दिखा रहा है तो कोई घड़ी की सुइयों से बुलेटिन की खबरों की संख्या मिला रहा है। एक तो इन सबसे आगे जा निकला। स्टूडियो को रेलवे प्लेटफॉर्म बनाकर मदारी का खेल दिखाने लगा। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के बेहद गंभीर मुद्दों पर परिचर्चा भी मुर्गा लड़ाने के अंदाज में होने लगी। पैनलिस्ट का चयन दंगल के पहलवानों की तरह होने लगा, ताकि चर्चा में विचार कम पड़ने लगें तो गाली-गलौज और शारीरिक शक्ति परीक्षण के जरिये दर्शकों को बांधे रखा जा सके। सबमें होड़ लगी है कि समाचार सुनने टीवी खोलकर बैठे दर्शकों का ज्यादा और बेहतर मनोरंजन कौन कर सकता है। अब यह दर्शकों को बेवकूफ समझने की बेवकूफी है या अपने अस्तित्व की रक्षा में जानबूझकर ओढ़ी मूढ़ता, इसका जवाब वही बेहतर दे सकते हैं।
